अघोरी
गंगा नदी के एक किनारे पर बिल्कुल निःशब्द रात्रि में कापालिकों का एक समूह अपनी साधना में लगा हुआ है,अधजली चिताओं के सुर्ख अंगारों से निकलने वाली रोशनी से तट की रेत भी कभी कभी अपनी चमक से अपने होने का अहसास करा देती है,पास में ही झुरमुट में खड़े हुए पेड़ों की आभा और जरा सी हवा की आहट पाते ही जोरों से झूमकर पत्तों की एक तेज आवाज वातावरण को और भी भयकारी बना देती है,मगर कापालिकों के इस समूह पर कोई भी भय का प्रभाव नहीं दिखाई दे रहा था,ऐसा लगता था जैसे ये इन लोगों का नियमित कार्य हो।
“शिष्य केशवानंद जा! जरा गंगा मैया से जल लेकर आ!” एक वृद्ध कापालिक ने अपने हाथों में पकड़े हुए कपाल को बालू पर सिंदूर से बनी हुई एक तिकोनी सी ज्यामितीय आकार की आकृति के मध्य स्थान पर रखते हुए आदेश दिया था। उस निस्तब्ध रात्रि में भी हल्की सी रोशनी में उस कापालिक के पूरे शरीर पर पुती हुई भस्म,चौड़े मस्तक पर भस्म के ऊपर सिंदूर से बना हुआ तिलक ,बड़ी बड़ी जटाओं को सिर के ऊपर कुंडलिनी आकार में लपेटा हुआ और लाल लाल सुर्ख आंखों के साथ ही गले में रुद्राक्ष की कई मालाओं और हाथ में पकड़ी हुई एक टेढ़ी मेढी सी छड़ी के साथ एक बार तो कोई साधारण मनुष्य भयभीत ही जाए,लेकिन कापालिक समूह के सभी अघोरी अपनी अपनी साधना में व्यस्त थे।
केशवानंद ने प्रतिउत्तर देते हुए कहा,”जी गुरु जी अभी लाया!”
केशवानंद के गुरु का नाम अघोरानंद था और वे कापालिकों के इस समूह के गुरु थे,जो इस समय अपने गुरु के मार्गदर्शन में अपनी अपनी अघोर साधना में व्यस्त थे।
केशवानंद अपने गुरु के आदेश का पालन करने के लिए अपने हाथ में एक नारियल का कमंडल पकड़े हुए जल लेने के लिए गंगा जी की ओर चल दिया।
उस अंधेरी रात में कभी कभी आती हुई उल्लुओं की आवाज और कापालिकों के द्वारा उच्चारित तेज मंत्रों के अतिरिक्त अन्य कोई भी आवाज सुनाई नही पद रही थी,चारों ओर निर्जनता और एक निःशब्द शांति…!
ओम हीं कलीम चामुंडाय नमः!
ओम हीं कलीम अघोराय नमः! जैसे तेज मंत्रों की आवाज के साथ ही सभी कापालिक अपनी अपनी साधना में लीन थे और केशवानंद भी गंगा मैया के पास तक पहुंच चुका था उसने अपने कदम बढ़ाते हुए धारा में कुछ अंदर तक जाने की कोशिश की और पहुंचकर अपने कमंडल को जल लेने के लिए डुबोया, डब डब की आवाज के साथ ही उसके कमंडल में गंगा जल भर चुका था और वो वापस जाने के लिए जैसे ही मुड़ा,एकाएक गंगा की धारा के साथ बहता हुआ एक शव उसके पैरों से टकराया और किनारे की ओर जाके बालू पर स्थिर हो गया।
“ शिव….शिव…!” केशवानंद के मुंह से अचानक ही निकल गया, और उसकी यह आवाज इतनी तेज थी कि उसके। गुरु अघोरानन्द के साथ साथ अन्य कापालिकों ने भी सुन ली थी।
“ केशवानंद क्या हुआ?” गुरु जी ने पूछा।
“ गुरु जी एक शव है!”
“धार में बह जाने दे,क्या लेना देना है तुझको किसी मुर्दे से!” अघोरानंद ने कहा।
“मगर गुरु जी ये शव तो किनारे आ गया है रेत पर!”
“रेत पर…..! “और यह कहकर अघोरा नंद ने अपनी दोनो आंखें बंद कर ली।
कुछ ही पलों के बाद उनके चेहरे पर एक मद्धिम मुस्कान थी और उन्होंने अपनी आंखें खोलकर कापालिकों से कहा, “ तुम लोग जाओ और उस शव को लेकर यहां आओ!”
समस्त कापालिकों के पास एक प्रश्न था, कि गुरुजी यह क्या कर रहे हैं,लेकिन प्रतिप्रश्न करने का साहस किसी में नहीं था। सभी कापालिक गुरु का आदेश मानने के लिए यंत्रवत चल दिए और केशवानंद कमंडल में गंगा जल लेकर गुरु जी के पास आ चुका था।
कापालिकों ने शव के बंधन खोलना आरंभ कर दिए थे,बंधन खोलकर ज्यों ही वस्त्र को हटाया तो कापालिकों ने उस मद्धिम रोशनी में भी देखा,शव एक किशोर वय बच्चे का था। उन्होंने शव को अपने हाथों में उठाया और अपने गुरु के पास पहुंच गए।
“इसको तब तक एक तरफ लिटा दो!” अघोरा नंद ने आदेश दिया, और स्वयं ही कुछ मंत्र बुदबुदाते हुए हाथ में पकड़े हुए सिंदूर और लकड़ी से रेत पर एक ज्यामितीय आकार में आकृति बनाने में लग गए,जब आकृति पूर्ण हो गई तो अपने उन कापालिक शिष्यों की ओर उन्मुख होते हुए बोले।
“तुम सभी अचंभित हो कि मैं क्या कर रहा हूं! मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर दे रहा हूं कि आत्मा अमर है, अजर है केवल देह को धारण करके अपने कर्मों को करती है और पुनः एक निश्चित अवधि के पश्चात अपने कर्मों के अनुरूप ही एक नई देह को धारण करती है,यह किशोर भी यहां एक निश्चित कर्म के लिए जन्मा था लेकिन अकाल मृत्यु से ये अपने कर्म पूर्ण न कर सका,इसकी मृत्यु होना और इसके शव का यहां आना सब पूर्व निर्धारित है,इसको ईश्वर ने भूलोक पर विशेष प्रयोजन के लिए भेजा है और उसमें हमको भी सहयोग करना है तभी इसका शव हम लोगों के पास आ पहुंचा! अब तुम सभी लोग इसका जीवन वापस करने में मेरा सहयोग करो,क्योंकि इसको सर्प दंश के कारण जल में प्रवाहित किया गया है और अभी इसके जहर को दूर करके इसको पुनर्जीवित कर सकते हैं,क्योंकि इसको अभी जन कल्याण करना है।”
इतना कहकर अघोरा नंद ने शव को रेत पर बनाई आकृति पर गंगा जल छिड़ककर लिटा देने का आदेश दिया। कापालिकों ने शव को लिटा दिया और अघोरा नंद ने शव के चारों ओर एक घेरा खींच कर, उसके ऊपर भस्म लगाना आरंभ कर दिया साथ ही साथ वो कोई मंत्र भी बुदबुदा रहा था,भस्म लगाने के बाद शव के ऊपर सिंदूर छिड़का और अपने पास रखे कपाल को उन्होंने शव के मस्तक पर रख कर सिंदूर और भस्म से अभिमंत्रित करना जारी रखा, इतना सब करने के बाद अघोरा नंद ने कापालिकों की ओर एक दृष्टि डाली और साधना में सहयोग करने का आदेश दिया।
अघोरा नंद पालथी लगाकर अब शव के सिरहाने बैठ चुका था और कुछ बुदबुदाते हुए मंत्रों का जाप कर रहा था साथ ही साथ बीच बीच में अपने कमंडल से गंगाजल की कुछ बूंदें भी शव पर छिड़कता जा रहा था,उसके इस तंत्र साधना में अन्य कापालिक भी उसका सहयोग कर रहे थे।
अघोरानंद ने अपनी तंत्र क्रिया उस शव को अपनी बनाई हुई उस तंत्र आकृति पर लिटाकर आरंभ कर दी थी,वो कुछ मंत्रों का जाप कर रहा था, और साथ ही साथ उसके कापालिक शिष्यों के द्वारा उनका दोहराव किया जा रहा था। कुछ मंत्र पढ़ने के बाद उसने अपने पास रखे सिंदूर और भस्म को मुट्ठी में लिया और शव पर छिड़कते हुए कमंडल से अपनी अंजुली में लेकर गंगा जल को छिड़का। किशोर का शव बिलकुल बर्फ की तरह ठंडा पड़ चुका था,लेकिन कापालिकों की साधना अनवरत चलती रही। लगभग एक घंटे तक यूं ही साधना करते रहने के बाद अघोरानंद ने अन्य कापालिकों को आदेश देते हुए कहा, “अब इसको उठाकर गंगा जी के तट पर ले चलो,और तुम दो लोग इसको पकड़कर वहां पर बिठाओ!” पुनः केशवानंद से कहा,”केशवानंद तुम मेरा कमंडल लेकर पहुँचो !”
“जो आदेश गुरुजी।” केशवानंद ने प्रत्युत्तर में सिर हिलाते हुए कहा।
शमशान में जल रही चिताओं की आग अब मद्धिम पड़ चुकी थी,और कुछेक चिताओं में मद्धिम पड़ चुकी लकड़ियों की दहक से निकलने वाली रक्त वर्ण रोशनी की चमक से वहां का दृश्य धुंधला ही सही मगर देखा जा सकता था।
कापालिकों के समूह ने अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए, उस किशोर वय के शव को उठाया और गंगा तट की ओर प्रस्थान किया,सभी के अंदर एक जिज्ञासा थी लेकिन गुरु से कोई भी प्रश्न पूछने की हिम्मत नही थी,भय या सम्मान कुछ भी समझा जा सकता था।
कापालिकों ने गंगा तट पर रजत वर्ण बालुका पर उस शव को बिठाया और दो कापालिकों ने उसकी बाहों को पकड़कर संतुलन बना दिया।
केशवानंद अपने हाथों में कमंडल को पकड़े हुए गुरु के पीछे पीछे आ रहा था, जो अब शव के पास आ रहे थे।
अघोरानंद ने तट पर पहुंच कर केशवानंद को आदेश दिया,”अब मैं मंत्रोचार आरंभ करूंगा और तुम मां गंगा से जल भरकर इसके शीश पर अद्यतन अभिषेक करते रहना,जब तक कि मैं मना न करूं।”
“जी गुरुदेव । “ केशवानंद ने कहा और जल लेने के लिए गंगा जी में उतर गया।
अघोरानंद ने पुनः अपनी साधना मंत्रो के साथ आरंभ कर दी,दोनो कापालिक शव की बाहों को पकड़कर उसका संतुलन बनाए हुए थे और केशवानंद जल लाकर शव का निरंतर अभिषेक किए जा रहा था। यह क्रिया लगभग आधे घंटे तक चलती रही।
आश्चर्य! दोनो कापालिक जो शव को पकड़कर बैठे थे, उनको अहसास हुआ जैसे शव में कुछ प्रतिक्रिया हो रही हो। और कुछ समय बाद ही उस किशोर वय के मुख से कुछ तरल बाहर की ओर निकलता दोनो ने प्रतीत किया। केशवानंद ने अपना जलाभिषेक का कार्य निरंतर जारी रखा और एकाएक उस किशोर वय शव ने अपने हाथों को क्रियाशील कर लिया, वो शरीर जो अभी कुछ समय पूर्व तक निर्जीव था अब सक्रियता परिलक्षित कर रहा था, और एकाएक उसने झटककर अपने दोनो हाथों को कापालिकों से छुड़ा लिया।
अघोरानंद जो अपनी मंत्र साधना में लगा था,उसने अपनी आंखें खोल दी और कापालिकों को दूर हट जाने का संकेत किया। ज्यों ही केशवानंद कमंडल में जल लेकर आया गुरु ने हाथ उठाकर अभिषेक के लिए रोक दिया। उस किशोर ने अपनी आंखें खोल दी थी,और ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई चेतना शून्य व्यक्ति बैठा हो जिसको न अपनी सुध और न ही दुनिया जहान की।
रात्रि भी अपनी विदाई बेला की ओर जाती प्रतीत हो रही थी,दूर कहीं गगन में एक चमकीला तारा अपनी आभा बिखेर रहा था,जिसे लोग भोर का तारा कहते हैं।
उसी भोर के तारे की चमकती रोशनी में अघोरानंद ने सभी कापालिकों को वापस आने का संकेत किया और उस किशोर को भी साथ लाने को कहा। किशोर जिसके शरीर पर कोई वस्त्र नही था,जैसे किसी नवजात बच्चे को प्रसव के बाद दाई मां अपने हाथों में आंचल से छुपाती है,ठीक उसी तरह उस किशोर के लिए अघोरानंद ने भी अपनी कमर से लपेटी हुई धोती से आधा भाग फाड़कर कापालिकों से उसके शरीर पर लपेटने का संकेत किया,कापालिकों ने यंत्रवत ही शीघ्रता से संकेतानुसार आदेश का पालन किया।
और अंततः शांति को चीरते हुए गुरु ने कापालिकों से कहना शुरू किया,”तुम्हारे सबके मस्तिष्कों में प्रश्न गूंज रहे होंगे,आखिर ये किशोर कौन है?और मैने तुम लोगों के साथ मिलकर इसको पुनः जीवन दान क्यों दिया है?”
कापालिकों के समूह में सन्नाटा छाया हुआ था,आखिर गुरु जी उनके दिलों की बात जान चुके थे।
अघोरानंद ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा,”यह किशोर दूर किसी गांव में जन्मा था, और इसको ईश्वर ने गांववालों को और लोगों को अन्याय और उनके दुःख दूर करने के लिए भेजा था,लेकिन अपने पूर्व जन्म के कर्मों के कारण इसको सर्पदंश से मृत जानकर इसके परिजनों ने गंगा जी में प्रवाहित कर दिया। लेकिन ईश्वरीय प्रेरणा और इसके द्वारा भविष्य में होने वाले अच्छे कामों के लिए गंगा मैया के द्वारा इसको हम लोगों तक भेजा गया जिससे हम सभी लोग मिलकर इसको जीवनदान दे सकें और उन नेक कार्यों को पूर्ण करने का मार्ग प्रशस्त कर सकें।” इतना कहकर गुरु जी कुछ क्षणों के लिए रुके और पुनः कापालिकों से कहना आरंभ किया,”अब इस जीवनदान के बाद इसको अपने पूर्व में व्यतीत किए गए जीवन के बारे में कुछ भी याद नहीं है,ये एक नवजात बच्चे की तरह है,इसको अपने माता पिता,घर परिवार,गांव कुछ भी याद नहीं है और न ही याद आएगा,अब से ये हम लोगों के साथ ही रहेगा और दीक्षा प्राप्त करके साधना करेगा,यही इसका घर परिवार होगा, और हम सब ही इसके पालनहार,केवल एक लक्ष्य होगा इसको श्रेष्ठ योगी बनाना! और आज से इसको एक नया नाम भी मिल जाएगा जो रहेगा शिवानंद!” गुरुजी ने कापालिकों को उनकी जिज्ञासा शांत होते ही आदेश दिया,”अब सभी लोग शीघ्रता पूर्वक अपनी अपनी तैयारी कर लो और हमको सुबह होने से पहले ही इस स्थान को छोड़कर वापस अपने साधना स्थल मणिकर्णिका घाट पहुंचने के लिए प्रस्थान करना होगा।”
गुरुजी का आदेश मिलते ही कापालिकों ने अपने प्रस्थान के लिए तैयारियां आरंभ कर दी,अपने अपने कमंडल और अभिमंत्रित कपालों को अपने अपने दंड के साथ ले लिया,केशवानंद ने शिवानंद के हाथ को पकड़ा और गुरु अघोरानंद के चलने की प्रतीक्षा की जाने लगी। अघोरानंद ने चलने से पूर्व बालुका पर बनाई हुई तंत्र आकृतियों को मिटाया तत्पश्चात वो धीरे धीरे मां गंगा के तट पर गया और किनारे पर करबद्ध होकर बैठ गया और गंगा को प्रणाम किया,एक तेज लहर का थपेड़ा तेजी से किनारे की ओर आया और अघोरानंद को भिगोते हुए वापस चला गया,उसके होठों पर एक मद्धिम सी मुस्कान तैर गई जैसे मां गंगा ने स्वयं आकर उसकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए उसे अपना आशीष प्रदान किया हो।
वो वापस घूमा और कापालिकों के पास जाने के लिए उद्धत हुआ, पूरब से हल्की सी लालिमा प्रतीत होने लगी वो नजदीक पहुंचा और सभी को चलने का संकेत किया,आगे आगे गुरु अघोरानंद और उसके पीछे पीछे कापालिकों का समूह अपने एक नए साथी शिवानंद के साथ चल दिए साधना पूर्ण करने के लिए मणिकर्णिका घाट बनारस की ओर,और पीछे छोड़ आए शमशान जहां आज जन्म हुआ था एक नए अघोरी का ।
आखिर किसका शव था यह और क्यों पुनर्जीवित करना चाहता था अघोरा नंद इसको?
क्या अघोरा नंद ने शव को पुनर्जीवित कर पाया या नहीं?
कौन से काम अधूरे रह गए थे जिनको पूरा करने के लिए कापालिकों के साथ शव को पुनर्जीवित कर रहा था अघोरा नंद और क्या कहानी जुड़ी थी उसके साथ? जानने के लिए पढ़ते रहिए।
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