अघोरी
गंगा नदी के एक किनारे पर बिल्कुल निःशब्द रात्रि में कापालिकों का एक समूह अपनी साधना में लगा हुआ है,अधजली चिताओं के सुर्ख अंगारों से निकलने वाली रोशनी से तट की रेत भी कभी कभी अपनी चमक से अपने होने का अहसास करा देती है,पास में ही झुरमुट में खड़े हुए पेड़ों की आभा और जरा सी हवा की आहट पाते ही जोरों से झूमकर पत्तों की एक तेज आवाज वातावरण को और भी भयकारी बना देती है,मगर कापालिकों के इस समूह पर कोई भी भय का प्रभाव नहीं दिखाई दे रहा था,ऐसा लगता था जैसे ये इन लोगों का नियमित कार्य हो। “शिष्य केशवानंद जा! जरा गंगा मैया से जल लेकर आ!” एक वृद्ध कापालिक ने अपने हाथों में पकड़े हुए कपाल को बालू पर सिंदूर से बनी हुई एक तिकोनी सी ज्यामितीय आकार की आकृति के मध्य स्थान पर रखते हुए आदेश दिया था। उस निस्तब्ध रात्रि में भी हल्की सी रोशनी में उस कापालिक के पूरे शरीर पर पुती हुई भस्म,चौड़े मस्तक पर भस्म के ऊपर सिंदूर से बना हुआ तिलक ,बड़ी बड़ी जटाओं को सिर के ऊपर कुंडलिनी आकार में लपेटा हुआ और लाल लाल सुर्ख आंखों के साथ ही गले में रुद्राक्ष की कई मालाओं और हाथ में पकड़ी हुई एक टेढ़ी मेढी सी छड़ी...


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